तुम्हारा रंग दुनिया ने छुआ था तब कहाँ थे तुम?

हमारा कैनवस ख़ाली पड़ा था तब कहाँ थे तुम?

मेरे लशकर में शिरकत की इजाज़त माँगने वालो!
मैं परचम थाम कर तन्हा खड़ा था तब कहाँ थे तुम?

तुम्हारी दस्तकों पर रहम आता है मुझे लेकिन
ये दरवाज़ा कई दिन से खुला था तब कहाँ थे तुम?

फलों पर हक़ जताने आए हो तो ये भी बतला दो
मैं जब पौधों को पानी दे रहा था तब कहाँ थे तुम?

ये बस इक रस्मिया तफ़तीश है, आराम से बैठो
वफ़ा का ख़ून जिस शब को हुआ था तब कहाँ थे तुम?

मुआ'फ़ी चाहता हूँ अब तो बस ख़बरों से मतलब है
मैं जब रूमानी फ़िल्में देखता था तब कहाँ थे तुम?

— Zubair Ali Tabish

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