
सुहागन भी बता देगी मगर तुम पूछो विधवा से
ये मंगलसूत्र ज़ेवर के अलावा भी बहुत कुछ है
ये क्या इक मक़बरे को आख़री हद मान बैठे हो
मोहब्बत संग-ए-मरमर के अलावा भी बहुत कुछ है
— Zubair Ali Tabish
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