bhare hue jaam par suraahi ka sar jhuka to bura lagega | भरे हुए जाम पर सुराही का सर झुका तो बुरा लगेगा

  - Zubair Ali Tabish

भरे हुए जाम पर सुराही का सर झुका तो बुरा लगेगा
जिसे तेरी आरज़ू नहीं तू उसे मिला तो बुरा लगेगा

ये ऐसा रस्ता है जिस पे हर कोई बारहा लड़खड़ा रहा है
मैं पहली ठोकर के बाद ही गर सँभल गया तो बुरा लगेगा

मैं ख़ुश हूँ उस के निकालने पर और इतना आगे निकल चुका हूँ
के अब अचानक से उस ने वापस बुला लिया तो बुरा लगेगा

ये आख़िरी कंपकंपाता जुमला कि इस तअ'ल्लुक़ को ख़त्म कर दो
बड़े जतन से कहा है उस ने नहीं किया तो बुरा लगेगा

न जाने कितने ग़मों को पीने के बा'द ताबिश चढ़ी उदासी
किसी ने ऐसे में आ के हम को हँसा दिया तो बुरा लगेगा

  - Zubair Ali Tabish

Shama Shayari

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