"लाज़मी अहसास"
ख़ुश-चेहरे ही अपने नहीं
अपनों को भी हसीं मानो
दिलकश सपनों का साहिल
आँखों तक कामिल जानो
उड़ती तितली ही सुंदर
मचलो न क़ैद करने को
यार का ही दामन थामो
जानिब-ए-मंज़िल चलने को
क्या ग़म उस का जब खोया
वो जिस को पाया ही नहीं
यूँ मुरझाओ नहीं जैसे
सर पर कोई साया नहीं
तेरे रहबर वही हैं जो
रिश्ते आए विरासत में
बस दौलत ये साथ लिए
चल तू ख़ुद की हिरासत में
ज़ख़्मी करता जाए जो
उस से क्यूँ मरहम की आस
जान जो वारा करता था
रख उस को सिरहाने पास
ख़्वाहिश के शो'ले नम करने
आँखों को मत कर ख़ाली
तेरी झोली में इक दिन
अज़ीज़ गुल देगा माली















