धूप की पहली किरण जिस पे सवारी चाय की
और अदरक की महक से इंतजारी चाय की
यार हम दोनों अलग पर इश्क़ अपना एक है
मेरे दिल से तेरे दिल तक बेशुमारी चाय की
इश्क़, दौलत और शोहरत इनका अपना है मज़ा
अपनी रग में दौड़ती बस इक खुमारी, चाय की
जब मुहब्बत हो जवां, रंगीन हो जब बारिशें
फिर कहाँ मिटती है यारों बेकरारी चाय की
उसके हाथों चाय की इक प्यास बाकी है मगर
ख़त्म करती ही नहीं वो इक उधारी चाय की
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