रास्तों की मुन्तजिर मंज़िल से निकली इक ग़ज़ल
मुद्दतों की प्यास ले साहिल से निकली इक ग़ज़ल
रात सूनी दिन भी सूना और सूना दिल मिरा
होंठ जब ख़ामोश थे तब दिल से निकली इक ग़ज़ल
रूह का हर कोना जब मैं ने तलाशा रात भर
तब ज़बाँ की जेब में मुश्किल से निकली इक ग़ज़ल
सुब्ह से ले शाम पहले तो इबादत में रही
हाथ में फिर जाम ले महफ़िल से निकली इक ग़ज़ल
शेल्फ में रक्खीं किताबें उन को तन्हा देख कर
कागज़ों को चूमने पेंसिल से निकली इक ग़ज़ल
— Aditya















