तो फिर हम ना रहेंगे हम अगर तुम मुझको मिल जाओ
मेरे धुल जाएँ सारे ग़म अगर तुम मुझको मिल जाओ
हर इक मौसम तुम्हारे बिन मुझे कांटे सा लगता है
गुलों से खिल उठें मौसम अगर तुम मुझको मिल जाओ
ज़माने भर के ज़ख़्मों को मैं पल भर में भुला दूँगा
ज़रूरी फिर नहीं मरहम अगर तुम मुझको मिल जाओ
मुझे डर है कि तुमको खो न दूँ इस भीड़ में इक दिन
बदल जाएगा ये आलम अगर तुम मुझको मिल जाओ
तुम्हारा और मेरा एक हो जाना हो जाएगा
इलाहाबाद का संगम अगर तुम मुझको मिल जाओ
उजाला चाँदनी का दिन में होगा और रातों में
खिलेगी धूप भी मद्धम अगर तुम मुझको मिल जाओ
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