झूठ मक्कारी फ़रेबी और जाने क्या से क्याआज कल इंसान में बाकी यही दस्तूर हैभूल कर अपनी हदें ख़ुद को समझते हैं ख़ुदाआदमी को आदमी रहना कहाँ मंज़ूर है— Aditya