ख़ुद-कुशी के सिवा ग़र कोई भी चारा होता
ज़िंदगी हम ने तेरा कर्ज़ उतारा होता
थाम लेता कोई तो हाथ हमारा दुख में
कोई तो इस दिल-ए-नादाँ का सहारा होता
जानता था मैं बुलाने से नहीं आओगे
ग़र चले आते तो अहसान तुम्हारा होता
ये तो मैं हार गया सामने उस की ज़िद के
वर्ना जो शख़्स हमारा था, हमारा होता
याद आते हैं वो तो उन की इनायत समझो
वर्ना 'आकाश' तेरा कैसे गुज़ारा होता
— Akash Rajpoot















