क्या बताऊँ तुझे उस शख़्स का क्या क्या न गया
हाल था ऐसा के देखे से भी देखा न गया
नीस्त-नाबूद मकानात किए यादों के
फिर भी इस ज़ेहन से उन यादों का मलबा न गया
क्यूँँ हो अफ़सोस के नाकाम मुहब्बत में हुए
अच्छे-अच्छों का भी ये इम्तिहाँ अच्छा न गया
तेरा मिलना मेरी तकदीर में लिक्खा था मगर
तेरा होना मेरी तकदीर में लिक्खा न गया
सब भुला देगा मिरे मरने पे समझा था मैं
बाद मरने के भी लेकिन तिरा शिकवा न गया
सोचता था कि सरे आम तुझे रुसवा करूँँ
पर तिरा नाम ज़बाँ पर कभी लाया न गया
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