ye ghazal bhi to hunar khoob ghazab rakhti hai | ये ग़ज़ल भी तो हुनर ख़ूब ग़ज़ब रखती है

  - Anis shah anis

ये ग़ज़ल भी तो हुनर ख़ूब ग़ज़ब रखती है
तल्ख़ हो लफ़्ज़ तो लहजे में अदब रखती है

प्यास ऊला से बढ़ाती है दिलों में सबके
और सानी में छुपा कर ये तलब रखती है

आईना एक ही तो अक्स दिखाता है हमें
ये ग़ज़ल ख़ुद में निहाँ कितनी ही छब रखती है

आशियाना तो ग़ज़ल का हमें रौशन लगता
ये दिलों को जला पुर-नूर जो शब रखती है

एक माशूक़ के जलवे भी बयाँ करती ग़ज़ल
दर्द-ओ-ग़म साथ ही बेवा के भी अब रखती है

ये ग़ज़ल ख़ुशबू लुटाती है सभी पर ही अनीस
फ़र्क़ सरहद या ज़बानों में ये कब रखती है

  - Anis shah anis

Democracy Shayari

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