ये ग़ज़ल भी तो हुनर ख़ूब ग़ज़ब रखती है
तल्ख़ हो लफ़्ज़ तो लहजे में अदब रखती है
प्यास ऊला से बढ़ाती है दिलों में सबके
और सानी में छुपा कर ये तलब रखती है
आईना एक ही तो अक्स दिखाता है हमें
ये ग़ज़ल ख़ुद में निहाँ कितनी ही छब रखती है
आशियाना तो ग़ज़ल का हमें रौशन लगता
ये दिलों को जला पुर-नूर जो शब रखती है
एक माशूक़ के जलवे भी बयाँ करती ग़ज़ल
दर्द-ओ-ग़म साथ ही बेवा के भी अब रखती है
ये ग़ज़ल ख़ुशबू लुटाती है सभी पर ही अनीस
फ़र्क़ सरहद या ज़बानों में ये कब रखती है
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