सर रखके जिनपे रोए वो शाने चले गए
सब ज़िंदगी से यार पुराने चले गए
तुम सच समझ रहे हो जिसे ख़्वाब है फ़क़त
हम ख़ुद को नींद में ये बताने चले गए
कुछ ज़ख़्म तेरी याद का पानी हैं भर रहे
कुछ ज़ख़्म मेरी प्यास बुझाने चले गए
अब है नहीं ये वक़्त यहाँ पर किसी का भी
अपने कभी थे जो वो ज़माने चले गए
आ कर कहा उन्होंने मिलेंगे वो रात में
फिर दिन कहीं वो और बिताने चले गए
इक शख़्स था ‘अभी’ कि जो हासिल न हो सका
इक आरज़ू थी हम जिसे पाने चले गए
— Abhishek Bhadauria 'Abhi'















