कब तक रखेगा क़ल्ब में अब यार फेंक दे
ये बे-फ़ुज़ूल माज़ी का अम्बार फेंक दे
मैं मानता हूँ तुझ पे ये जँचता है ख़ूब पर
मेरी सलाह मान ये पिंदार फेंक दे
चाहे तो जान ले मेरी पर बख़्श दे दरख़्त
हत्ताब अपने हाथ से मिंशार फेंक दे
हाकिम से बोलो ले ज़रा मणिपुर का जाइज़ा
सिर से वगरना आज ही दस्तार फेंक दे
हथियार अपने कर में उठा ले तू द्रोपदी
मोहन से अब मदद के तू आसार फेंक दे
हाँ उस के दिल में तू नहीं है कोई और है
उसपर लिखी ये नज़्म ये अश'आर फेंक दे
अल्लाह अपने मुल्क के हालात देख कर
मैं तो यही कहूँगा ये सरकार फेंक दे
— Daqiiq Jabaalii















