चमन में भी कली घबरा रही है
क़यामत अब यक़ीनन आ रही है
कमी होती नहीं है दर्द-ओ-ग़म में
ये दौलत रोज़ बढ़ती जा रही है
सिवा ख़्वाबों के देखा ही नहीं था
तुम्हारी आँख धोखा खा रही है
उन्हें दिल से गए मुद्द्त हुई हैं
अभी तक उनकी ख़ुशबू आ रही है
चलो तक़दीर अपनी ख़ुद लिखें हम
भले ये ज़िन्दगी भटका रही है
किसी की आह निकली कहकहों में
किसी को तो ग़ज़ल ये भा रही है
जवानी में धरम भूले क़ज़ा को
अभी तो ज़िन्दगी इतरा रही है
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