इतना भी वक़्त हम को कज़ा ने नहीं दिया

नाकामियों का जश्न मनाने नहीं दिया

हम को यक़ीन अपने बुज़ुर्गो पे है बहुत
चौखट पे सर कहीं भी झुकाने नहीं दिया

मंज़िल की जुस्तजू में परीशाँ थे यार हम
कितना सफ़र था सख़्त बताने नहीं दिया

आँखों में अश्क भर के कहा उस ने अलविदा
एहसान आँसुओं का उठाने नहीं दिया

दिल ने कहा वतन के लिए जाँ लुटाने जा
मौक़ा मिला तो हम ने भी जाने नहीं दिया।

दिल में ही दफ़्न कर के रखे अपने दर्दो-ग़म
अश्कों को बे-सबब ही लुटाने नहीं दिया

बोसे तमाम चाँद के लेने नज़र से थे
बदली ने छत पे चाँद को आने नहीं दिया

— Dharamraj deshraj

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