मुसीबत है बला है और मैं हूँ

ग़मों से सामना है और मैं हूँ

परेशाँ इश्क़ कर के हो गया दिल
जहाँ दुश्मन हुआ है और मैं हूँ

मुहब्बत की सज़ा है क़त्ल करदो
तुम्हारा फ़ैसला है और मैं हूँ

वो पत्थर नफ़रतों के साथ लाया
लबों पर बद-दुआ है और मैं हूँ

ज़माना कितने ही तूफ़ाँ उठाले
मेरे सँग में ख़ुदा है और मैं हूँ।

मुझे मालूम है मंज़िल किधर है
तिरे घर का पता है और मैं हूँ

ख़रीदेगा 'धरम' को वो भला क्या
वो नफ़रत से भरा है और मैं हूँ

— Dharamraj deshraj

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