वो अपने दिल में अगर मेरी जुस्तजू करते
तो आईने से अकेले न गुफ़्तगू करते
ज़माना हमको दिवाना कहीं न कह बैठे
हम अपना चाक गिरेबाँ न फिर रफू करते
तुम्हारे दिल में अगर रब मुझे नहीं दिखता
तुम्हारी जुस्तजू ऐसे न कू ब कू करते
क़शिश बला की है उस
में वो मेरी मंजिल है
तमाम उम्र कटी उसकी आरज़ू करते
अदब की हम सेे हदें आज टूट ही जाती
हम अपने ग़म का फ़साना अगर शुरू करते
हम अपनी एक ख़ता पर ही सर कटा देते
गिला हमारा अगर हम सेे रु ब रु करते
यही तो एक ख़ता हो गई "धरम" हम सेे
जो बे-वफ़ा को ज़माने में सुर्ख़रु करते
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