दो क़दम का भी सहारा था बहुत
दो क़दम में भी निभाना था बहुत
ज़िंदगी इस सेे ज़ियादा भी नहीं
हाँ मगर इस
में तमाशा था बहुत
लेके कोई चीज़ जानी भी नहीं
फिर भी सब को ही दिखाना था बहुत
कहता हूँ कोई नहीं मेरा यहाँ
कहके अपनों से जताना था बहुत
हो न हो परवाह ये देखे बिना
कहते रहना है हमारा था बहुत
बोलता अच्छा नहीं लगता उन्हें
गूँगा होकर के सुनाना था बहुत
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