कहता था ग़म देखा नहीं है दूर भी
जब 'इश्क़ में देखा लगा मजबूर भी
शायर बना तस्वीर टूटे दिल की तू
झूठी कहानी का न रख दस्तूर भी
थी तीरगी पर मग्न बच्चा खेल में
माँ बाप की तो छाँव ही है नूर भी
हो ख़्वाब सारे पूरे तो आता अहम
हो जाए कुछ उस
में से चकनाचूर भी
इक ख़ासियत हर दिलरुबा में थी 'धरम'
हो सामने जब फेल लगती हूर भी
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