mulaqaat ka vaa'da kar ke mukar ja | मुलाक़ात का वा'दा कर के मुकर जा

  - "Dharam" Barot

मुलाक़ात का वा'दा कर के मुकर जा
किसी और का होके तो तू सुधर जा

मैं तन्हाई को चाहता हूँ मेरे पास
मेरा मान रख-कर सनम अपने घर जा

नए झूठ हर रोज़ ही बोलना और
तू ऐसे ही मेरी नज़र से उतर जा

किसी बात पर जल्द बाज़ी नहीं रे
ज़रा सोच आराम से फिर ठहर जा

हुकुम का ये इक्का नहीं आता अब काम
सभी ने रखें पाल जोकर जिधर जा

दिखाए कोई अपना जब रास्ता सर्द
'धरम' रास्ता सर्द है भूल कर जा

  - "Dharam" Barot

Raasta Shayari

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