ambar sa ho ambaar kya hi kaam ka | अंबर सा हो अंबार क्या ही काम का

  - "Dharam" Barot

अंबर सा हो अंबार क्या ही काम का
दुश्मन सा हो गर यार क्या ही काम का

अच्छी उदासी ज़िंदगी भर की मेरी
दो चार दिन का प्यार क्या ही काम का

जब मुँह फुला कर बोली हाँ मुझको लगा
इनकार सा इक़रार क्या ही काम का

सब आगे आए हाँ में हाँ करने को बस
राजा का ये दरबार क्या ही काम का

अच्छी नहीं लगती ख़बर कोई भी अब
बिन एड का अख़बार क्या ही काम का

बोला था रहकर महल में हर दिन फ़क़ीर
सोने का भी हो द्वार क्या ही काम का

  - "Dharam" Barot

Dushmani Shayari

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