जो भी मैं कहता हूँ वो लोगों को झूठा लगता है

है ये उलझन अब मुझे क्यूँ उन को ऐसा लगता है

मुझ को वो काफ़ी परेशानी में रखता है मगर
जाने क्यूँ वो शख़्स मुझ को फिर भी अच्छा लगता है

क्या कहा वो तुम से मेरी भी बुराई कर गया
जो मेरे ख़्वाबों में आ कर मुझ को अपना लगता है

मैं तो अपनी ज़िंदगी में इतना हारा हूँ कि अब
दर्द भी मिलता है तो अब वो भी प्यारा लगता है

कौन आए कौन जाए कौन अब दिल में रहे
ये ख़याल अब तो मुझे काफ़ी पुराना लगता है

प्यार में हूँ या यूँ लगता है कि मैं बर्बाद हूँ
एक पल में जीना मरना जाने क्या क्या लगता है

जिस की यादों में कहीं भी मेरा हिस्सा है नहीं
उस को पाना भी मुझे तो एक सपना लगता है

— Yash Sharma

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