dhalti si zindagi hai chalo ham dua karen | ढलती सी ज़िन्दगी है चलो हम दुआ करें

  - Shadab Asghar

ढलती सी ज़िन्दगी है चलो हम दुआ करें
इक दूसरे के हक़ में ज़रा इल्तिजा करें

मज़हब ने कब सिखाया है आपस में बैर हो
क्यूँ हम कभी किसी के लिए बद्दुआ करें

अब आप ने ही माना है ज़ालिम को हुक्मरां
अब कोई हक़ नहीं है कि अच्छा बुरा करें

ये कह के घर से उसने निकाला है माई को
निकलें यहाँ से आप कहीं और रहा करें

मालूम है हमीं पे ज़माने की है नज़र
फिर क्यूँ के जान बूझ के कोई ख़ता करें

वाक़िफ़ नहीं हैं अब के सुख़नवर लबों से आप इश्क़-ए-मिज़ाजी छोड़ भी, ग़ज़लें कहा करें

  - Shadab Asghar

Mehboob Shayari

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