वफ़ा पर तेरी दिल है आने के क़ाबिल

मेरी जाँ है तुझ पे लुटाने के क़ाबिल

मदीने से बतहा-ओ-बतहा से कूफ़ा
सफ़र ये है सब को रुलाने के क़ाबिल

रखो मजलिसे शाहे-कर्बोबला की
ये आँसू वहाँ है बहाने के क़ाबिल

उठा कर यूँ बोले थे असग़र को मौला
है राहे ख़ुदा में लुटाने के क़ाबिल

हमें पेशे ख़ालिक़ सुनो आख़िरत में
यही पाँच हैं बस निभाने के क़ाबिल

ये सर जब तेरे आस्ताँ पर झुका है
हुआ है ये सर तब उठाने के क़ाबिल

फ़क़त दोनों आलम में बस ज़ुल्जना है
सवारे-नबी को उठाने के क़ाबिल

हुसैनो हसन का वो मीरे-मलायक
हैं जिब्रील झूला झुलाने के क़ाबिल

कोई ऐसा क़ारी हुआ ही नहीं है
हो नेज़े पे क़ुरआँ सुनाने के क़ाबिल

दबी रह गई “क़ैस” लब पर न आई
जो थी बात उन को सुनाने के क़ाबिल

— Faizan Sheikh Qais

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