"कुतुब ख़ाना"
मेरे घर में मैं इक कमरा बनाऊँगी,
वो कमरा सारे कमरों से बड़ा होगा
किताबें ही रहेंगी पूरे कमरे में
किताबें इतनी कि जितने कि चाहत है तुम्हारे साथ के पल पल की मुझ को,
तो मैं जब भी मिल न पाऊँगी तुम्हें उस पल किताबों को पढूँगी
और वहाँ पर इक बड़ी तस्वीर भी टाँगूँगी मैं,
जिस पर बने होंगे मुक़द्दस दो चराग़ उन से उजाला ही उजाला है मेरे कमरे में जीवन में,
सुनो! वैसे तुम्हारी आँखों के बारे में बातें कर रही हूँ मैं,
किताबों से कहीं ज़्यादा पढूँगी मैं उन आँखों को।
— Firdous khan















