"तुम्हारे बिन गुज़ारा वक़्त"

तुम्हारे बिन कटा जो वक़्त वो ऐसे कटा मेरा
इक इक सेकंड कटा मिनटों में
और हर इक मिनट में तो
कई घंटे बिताऐ हैं
ये घंटे मेरा दिन भर खा गए हैं
मैं घड़ी की सूई पर अटकी हुई इक लाश लगती हूँ बदन में रूह तो है ही नहीं पर
वक़्त का काँटा बदन को ढो रहा है
मेरा दिन साल लगता है
चलो ये साल भी काटूँ तो फिर आ जाती है इक रात
ये रातें बोझ लगती हैं
बहुत बरसों बरस में बीत ती है इक अकेली रात तो मैं इन सितारों को बुझा कर के फिर अपना दिल जला कर के उजाला ख़ुद बनाती हूँ सो मैं इस तरह से बरसों यूँ तुम से दूर रह रह कर
नया इक दिन उगाती हूँ
तुम्हारे बिन गुज़ारा वक़्त फिर से काटने को बस

— Firdous khan

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