बैचलर का वो ज़माना जा चुका
कंबलों में फ़ोन आना जा चुका
हर दर-ओ-बाम-ए-मकाँ जब याद था
आशिक़ी का वो ज़माना जा चुका
अब कभी दिल्ली नहीं सज पाएगी
इस गली से वो दिवाना जा चुका
हिज्र में अब मर नहीं जाते है हम
क़ैस का था इक ज़माना जा चुका
ऑफ़िसों के रंग में ऐसे ढले
नज़्म गाना गुनगुनाना जा चुका
बज़्म जिन कंधों से देखा था कभी
बाप का जो था वो शाना जा चुका
— Happy Srivastava 'Ambar'















