तेरे ख़याल तेरे ख़द्द-ओ-ख़ाल के अंदर
उतर गया हूँ मैं हुस्न-ओ-जमाल के अंदर
वो कौन है जो तेरे जाल में नहीं अटका
वो जाल जो बना है तेरे गाल के अंदर
ये मेरा दिल भी कुछ ऐसे धड़कता है जैसे
कि फड़फड़ाए कोई पंछी जाल के अंदर
न तेरे सत्ह से ऊपर न तह पे हूँ यानी
अटक गया हूँ उरूज-ओ-ज़वाल के अंदर
वगरना फ़ायदा क्या हम-ख़याल होने का
जब ए'तिबार न हो हम-ख़याल के अंदर
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