आदमी इक सर झुकाए जो खड़ा था
पास से देखा अरे वो ही ख़ुदा था
गिड़गिड़ाया शान से जिस ने जिया था
बाप था मेरा मेरी ख़ातिर झुका था
शुक्रिया है आप का जो आप आए
ज़िंदगी का रंग फीका पड़ रहा था
आप से मिल कर लगा तो झूठ था सब
आप के बारे में जितना भी सुना था
ये लगा सौ साल मुझ से है बड़ा वो
जिस से मैं दस साल से ज़्यादा बड़ा था
लोग कहते हैं इसी बरगद के नीचे
न्याय होती थी ये जब काफ़ी घना था
थे बिना घर के कई जिस गाँव अंदर
एक मस्जिद और इक मंदिर बना था
इस ग़ज़ल के शे'र में ज़्यादा नमी है
ज़ीस्त में पानी ज़ियादा हो गया था
— Pushpendra Mishra















