"ज़ुल्म"
मैं अपने हाथों की
सारी नसें काट देना चाहता हूँ
ताकि मेरे जिस्म से
वो सारा ख़ून बह जाए
जो ज़ुल्म को देख कर
नहीं खौलता
मैं अपने सीने से
उस दिल को
निकाल के फेंक देना चाहता हूँ
जो हुकूमत के ख़िलाफ़
लड़ने से डरता है
मैं अपने उन आँखों को
नोच के फेंक देना चाहता हूँ
जो बहुत बेशर्म हो चुकी हैं
जो ज़ुल्म-ओ-सितम को
देख कर अंधे होने का नाटक करती हैं
मैं अपने उस ज़बान को
काट कर फेंक देना चाहता हूँ
जिस से इंकलाब का नारा नहीं बोला जाता
या'नी कि कुल मिला कर
मैं उस जिस्म को मिटा देना चाहता हूँ
जो सोफ़े पे लेटे हुए
टीवी पे हुकूमत की तानाशाही देख रहा है
मैं अपने अंदर के उस आदमी को
ज़िंदा रखना चाहता हूँ
जिस की आँखें जिस का दिल
जिस का ख़ून जिस का लब
हुकूमत की तानाशाही पे ख़ामोश न रहता हो















