ab mere KHvaab ki ta'beer nahin banti hai | अब मेरे ख़्वाब की ता’बीर नहीं बनती है

  - Khalid Azad

अब मेरे ख़्वाब की ता’बीर नहीं बनती है
दर्द की कोई भी तस्वीर नहीं बनती है

हर दफा़ तेरी मैं यादों से किनारा चाहूँ
लाख सोचूं कोई तदबीर नहीं बनती है

जिस तरह तू ने मुझे ख़ुद से अलग रखा है
यार इतनी मेरी ता’ज़ीर नहीं बनती है

कुछ इशारा तेरी जानिब से हुआ ही होगा
इस तरह कोई भी तशहीर नहीं बनती है

रंग शायद ये मुहब्बत का उतर अब जाए
वो मेरे पांव की ज़ंजीर नहीं बनती है
'इश्क़ जब समझा तो ये ज़ीस्त खुली है मुझ पे
इस से बेहतर कोई तफ़सीर नहीं बनती है

  - Khalid Azad

Freedom Shayari

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