घर से निकला था फक़त मैं इक सफ़र के वास्ते
क्या ख़बर थी चल पड़ा हूँ 'उम्र भर के वास्ते
इन हवाओं से हमें मिल तो गया है इक सुकूँ
पर परिंदे रो पड़े हैं अपने घर के वास्ते
धूप की शिद्दत से जब हम हो गए लाचार तो
फिर तड़पते रह गए हैं उस शजर के वास्ते
ख़्वाब तो देखे बहुत पर रास कुछ आया नहीं
तेरा चेहरा चाहिए था इस नज़र के वास्ते
उसकी ख़्वाहिश बस है इतनी देख ले बेटा ज़रा
कुछ नहीं अब चाहिए उसको गुज़र के वास्ते
ख़्वाहिशों का बोझ लेकर बे वजह चलते रहे
एक जुगनू ही बहुत था उस सहर के वास्ते
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Khalid Azad
our suggestion based on Khalid Azad
As you were reading Rishta Shayari Shayari