apne badan kii chaah men bhatka hooñ 'umr bhar | अपने बदन की चाह में भटका हूँ 'उम्र भर

  - Khalid Azad

अपने बदन की चाह में भटका हूँ 'उम्र भर
दुनिया तेरी निगाह में भटका हूँ 'उम्र भर

उसको कोई ख़बर भी नहीं मेरे ज़ख़्म की
मैं जिसकी एक आह में भटका हूँ 'उम्र भर

सहरा की सख़्त धूप से रिश्ता निभा दिया
लेकिन तुम्हारी राह में भटका हूँ 'उम्र भर

दुनिया वफ़ा ख़ुलूस की अब तो नहीं रही
मैं फिर भी इस गुनाह में भटका हूँ 'उम्र भर

  - Khalid Azad

Kamar Shayari

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