हर इक महफ़िल में है चर्चा हमारा
अजब है दर्द का क़िस्सा हमारा
ज़रा सा ख़ुद को मैं ने चुप किया तो
बहुत अच्छा निभा रिश्ता हमारा
मुहब्बत के सफ़र पे चल पड़ा हूँ
इसी से जा मिले शजरा हमारा
भला मंज़िल कहाँ से चैन देगी
कहीं भी दिल नहीं लगता हमारा
इसी डर से कमाया हर तरह से
कोई कब पूछ ले रुतबा हमारा
पुराना हो चुका मजनू का क़िस्सा
सो अब सहरा पे है कब्ज़ा हमारा
हज़ारों ज़ख़्म पे सुधरा नहीं है
अजब है दिल का ये जज़्बा हमारा
— Khalid Azad















