ग़म है तेरा ख़याल है कितना अजीब हाल है

फिर भी नहीं मलाल है कितना अजीब हाल है

हो हिज्र या हो वस्ल वो मैं तो क़फ़स में ही रहा
जीना मेरा मुहाल है कितना अजीब हाल है

मैं ने नहीं लिखा कभी कुछ दर्द के सिवा मग़र
फिर भी ग़ज़ल कमाल है कितना अजीब हाल है

लैला भी हो गई है अब सारे जहाँ के साथ ही
ये इश्क़ का ज़वाल है कितना अजीब हाल है

कितना अजीब हाल था गुज़रा जो पिछला साल था
गुज़रा जो अबकी साल है कितना अजीब हाल है

उस को भुला के भी कभी दिल से जुदा नहीं किया
ख़ालिद का ये कमाल है कितना अजीब हाल है

— Khalid Lakhnavi

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