गर मिरे हाथ में होता नहीं होने देता
मैं कभी चाँद को तुझ सा नहीं होने देता
अब तो सब ठीक है लेकिन ये जो माज़ी है ना
आज भी तुझ पे भरोसा नहीं होने देता
बच गया है जो तिरा थोड़ा सा हिस्सा मुझ में
अब तलक मुझ को किसी का नहीं होने देता
उस की तख़्लीक़ में होता जो मिरा दख़्ल तो मैं
किसी मिट्टी को खिलौना नहीं होने देता
हाँ मरज़ है मगर इतना भी कोई ख़ास नहीं
चारा-गर ख़ुद मुझे अच्छा नहीं होने देता
मैं तो तन्हा हूँ मगर और किसी को 'जाँ-बाज़'
अपने होते कभी तन्हा नहीं होने देता
— Khan Janbaz















