zara sa aur khuda ke qareen banaaunga | ज़रा सा और ख़ुदा के क़रीं बनाऊँगा

  - Khan Janbaz

ज़रा सा और ख़ुदा के क़रीं बनाऊँगा
मैं आ
समाँ पे किसी दिन ज़मीं बनाऊँगा

कोई भी हो मगर इक रोज़ टूट जाता है
किसी से अब कोई रिश्ता नहीं बनाऊँगा

इस एक तरफा मोहब्बत का मैं नहीं क़ायल
सो उस तऱफ से भी दिल में यक़ीं बनाऊँगा

कोई तो घर में हो तन्हाई के इलावा भी
मकाँ बने न बने पर मकीं बनाऊँगा

ऐ फूल तोड़ के पैरों से रोंदने वाले
मैं किस तरह तुझे दिल का अमीं बनाऊँगा

वो क़ैस रेत पे लैला का नाम लिखता था
मैं उँगलियों से तुम्हारी जबीं बनाऊँगा

  - Khan Janbaz

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