कमान मुझ पे ही ता'ने मेरी कमीन में है
वो मेरा दोस्त है और मेरी आस्तीन में है
वही है हुक्म मुहब्बत में बे-वफाई का
जो हुक्म-ए-शिर्क-ए-इलाही ख़ुदा के दीन में है
किसी की याद है जो दिल से दूर जाती नहीं
किसी की शक्ल है जो अब भी दूरबीन में है
इस इज़तराब का अव्वल तो कुछ इलाज नहीं
अगरचे है भी कोई तो तेरी जबीन में है
तमाम फ़िल्म में जो वाक़्या कहीं भी नहीं
हमें बताया गया था के लास्ट सीन में है
रक़ीब जिस को बताता है शाह-कार ग़ज़ल
वो शाह-कार ग़ज़ल भी मेरी ज़मीन में है
— Khan Janbaz















