kamaan mujh pe hi taane meri kameen men hai | कमान मुझ पे ही ताने मेरी कमीन में है

  - Khan Janbaz

कमान मुझ पे ही ताने मेरी कमीन में है
वह मेरा दोस्त है और मेरी आस्तीन में है

वही है हुक्म मुहब्बत में बे-वफाई का
जो हुक्म-ए-शिर्क-ए-इलाही ख़ुदा के दीन में है

किसी की याद है जो दिल से दूर जाती नहीं
किसी की शक्ल है जो अब भी दूरबीन में है

इस इज़तराब का अव्वल तो कुछ इलाज नहीं
अगरचे है भी कोई तो तेरी जबीन में है

तमाम फ़िल्म में जो वाक़्या कहीं भी नहीं
हमें बताया गया था के लास्ट सीन में है

रक़ीब जिसको बताता है शाह-कार ग़ज़ल
वो शाह-कार ग़ज़ल भी मेरी ज़मीन में है

  - Khan Janbaz

Raqeeb Shayari

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