इक ज़रा बात पर अपने से पराए हुए लोग

हाए वो ख़ून पसीने से कमाए हुए लोग

मुझ में ऐसे वो रहा जैसे किसी साए में
दो घड़ी बैठते हैं दूर से आए हुए लोग

बह भी सकता है किसी रोज़ ये सूखा दरिया
आ भी सकते हैं कभी याद, भुलाए हुए लोग

शाम होते ही चले आते हैं आँसू बन कर
ख़्वाब की तरह इन आँखों में सजाए हुए लोग

ज़िंदगी, बीच से उठ कर न चले जाएँ कहीं
तेरी महफ़िल में ज़बरदस्ती बिठाए हुए लोग

कोई बेजा तो नहीं तुझ से जो शिकवा है मुझे
देख किस हाल में हैं तेरे बनाए हुए लोग

— Khan Janbaz

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