भूख कुछ यूँँ दबा ली
चाय पी ब्रेड खा ली
इक दबी हूक थी जो
हमने लब पे सजा ली
राह तकते रहे हम
उसने मंज़िल भी पा ली
उसने उम्मीद की लौ
आँसुओं से बुझा ली
दूर थी शय जो कल तक
आज आदत बना ली
उसने रस्ता बदल कर
अपनी तेज़ी बढ़ा ली
कर के बदनाम उस को
अपनी पहचाँ बना ली
ख़ुद से मिलने की ख़ातिर
घर की घंटी बजा ली
नाम 'रोहन' जो चमका
कॉल झट से उठा ली
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