नौबत मुझे ये बात छुपाने में आ गई
मेरी जफ़ा की बात ज़माने में आ गई
कोशिश रहा वो करता तअल्लुक़ मिटाने की
मैं समझा था कमी ही निभाने में आ गई
इज़हार का था चर्चा बहुत पहले से मगर
सोहबत की बात मेरे घराने में आ गई
कोशिश रही भुलाने की माशूक़ को मगर
यादें पुरानी याद भुलाने में आ गई
किरदार मुख़्तसर था मैं उसकी कहानी में
कारीगरी मेरी भी फ़साने में आ गई
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