गई जो जान तब अब के नहीं जानी
हसीं वो रात बीती फिर नहीं आनी
जताते प्यार कितना और कब तक यूँ
गया थक मैं मनाते तू कहा मानी
कहा सुनता किसी की तू कभी इक भी
वही तो तू करे करने की जो ठानी
रहें लड़ते हुए सोचा कभी ना ये
बनी है बीच जो दीवार है ढानी
उदासी है चले जाने से तेरे जो
की लगता है ख़ुशी तो अब नहीं आनी
बहे ग़म जा रहें आँखों सहारे थे
कभी जो अश्क थे अब है महज़ पानी
— Kohar















