ख़ुदा की हर बनावट से जो उल्फ़त हो तो अच्छा है
गुलों के साथ काँटों से भी निस्बत हो तो अच्छा है
कभी फ़ुर्सत में अपने आप से भी कीजिए झगड़ा
कभी ख़ुद से भी ख़ुद अपनी शिकायत हो तो अच्छा है
नदी पर्वत सितारे ख़ूब-सूरत हैं सभी लेकिन
नज़रिया आदमी का ख़ूब-सूरत हो तो अच्छा है
हमेशा लोग ता'रीफ़ें नहीं करते हैं बर-ख़ुरदार
जहाँ के तंज सहने की भी आदत हो तो अच्छा है
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















