हम ज़माने से डरते हुए लोग
मज़हबों में हैं बिखरे हुए लोग
इक तरह से वो जीते हुए हैं
उस की आँखों से हारे हुए लोग
बस किनारे से ही देखते हैं
वो समुंदर से डरते हुए लोग
उस की ख़बरें बताते हैं मुझ को
उस की जानिब से आते हुए लोग
फिर दुबारा नहीं आते वापस
हिज्र की और चलते हुए लोग
मुँह छुपाते हुए भागते हैं
क़ाफ़िलों से निकाले हुए लोग
— Ammar 'yasir'















