कहानी से या तो ये दफ़्तर निकालो
या अंदर से मेरे सुख़न-वर निकालो
कहीं ये न हो फ़र्ज फिर से कुचल दे
दबी ख़्वाहिशों देखकर सर निकालो
निकालो मुझे तुम न यूँँ थोड़ा थोड़ा
जो दिल से निकालो तो यकसर निकालो
यहाँ पर तो अंदर से ज़्यादा घुटन है
मुझे यार बाहरस बाहर निकालो
ये ख़ंजर वगरना तो दम तोड़ देगा
मेरे दिल से कोई ये ख़ंजर निकालो
मुझे नाम मजनू का दे ही रहे हो
तो फिर मेरे हिस्से के पत्थर निकालो
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