उस के चेहरे की वो शफ़्फ़ाफ़ी और कँवल आँखें
बदन उर्दू अदब और उस पे वो ग़ज़ल आँखें
संग-ए-मरमर से तराशा ये मख़मली पैकर
और देती हुईं इस दिल-कशी को बल आँखें
पार जब से किया जोबन का दर उन आँखों ने
किसी की खोज में रहती हैं आजकल आँखें
मतला-ए-ज़ुल्फ़ से मक़्ता-ए-नाख़ुन-ए-पा तक
तुझ पे वाजिब हैं तिरी हासिल-ए-ग़ज़ल आँखें
कर नहीं पाते बयाँ लब जो बे-तकल्लुफ़ी से
फ़ाश करने में वो जज़्बात हैं कुशल आँखें
— Milan Gautam















