"शिकवा"
शिकवा नहीं कुछ ऐ ज़िंदगी तुझ से
नहीं माँगना अब कुछ और ख़ुद से
जो चाहा नहीं मिला तुझ से
अब क्या उम्मीद रखूँ कुछ और ख़ुद से
राबता क्या करूँ ऐ रब तुझ से
तू भी तो बड़ा ख़ुद्दार है
इबादत करते रहे हम तुझ से
और तू कहता रहा मंज़िल दरिया के उस पार है
दरिया का वास्ता भी तो था तुझ से
और मेरा इश्क़ भी तो ठहरा हुआ है
तू आ सकता था कहीं मिलने मुझ से
क्यूँ मुझे बुलाया बड़ा ग़द्दार है
वो जो मेरा था मेरा न हुआ ख़ुद से
ज़िंदगी बड़ी बर्बाद है
अब तो उम्मीद ही बाक़ी है रब से
लगता है जैसे यहीं कहीं आस पास है
— Krishna dixit















