मैं चराग़ों की तरह जो रात भर जलता रहा
ये न पूछो किस तरह मैं राख में ढलता रहा
रौनक़ें जाती रही मेरे नज़र के सामने
मैं मुक़द्दर का सताया हाथ ही मलता रहा
लौट आया दर वो मेरे ग़म ख़ुशी को थामकर
एक मुद्दत से वही जो हादसा टलता रहा
ज़िंदगी ने थामकर जिस राह पर छोड़ा मुझे
एक लंबी राह थी उस राह पर चलता रहा
है नहीं शिकवा मुझे जो भी गए अच्छा गए
यार तेरा छोड़कर जाना मुझे खलता रहा
अजनबी तुझ सेे मिला जो मिल गई थी ज़िंदगी
हाँ बुरा सा ख़्वाब था पर ख़्वाब भी पलता रहा
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