यार मुझ में ही कमी थीज़िंदगी तो क़ीमती थीफूल सब थे ग़ुस्से के वोतितली मुझ पे बावली थीउस ने दिल को ऐसे बाँधाराग जैसे भैरवी थीजब लगूॅं सबके गले मैंआँखों से वो डाॅंटती थीखिड़कियाँ वो खोल देतीतब यही बस आशिक़ी थी— Amanpreet singh