अभी तक उस सफ़र की याद आती है
हर इक दीवार-ओ-दर की याद आती है
मैं वो भटका परिंदा हूँ जिसे अब भी
बुज़ुर्गों के शजर की याद आती है
मेरे हिस्से से गर वो जा चुका है तो
अभी क्यूँ उस नज़र की याद आती है
मैं जब दादास पूछूँ उन के ज़ख़्मों की
उन्हें लाहौर घर की याद आती है
यूँॅं बैठा सोचता हूँ काश इस लम्हे
उधर होता जिधर की याद आती है
— Amanpreet singh















